Saturday, 22 December 2018

चौधरी चरण सिंह जी की जयंती व किसान दिवस : कुलदीप रियाड़

चौधरी चरण सिंह जी की जयंती और किसान दिवस

"देश की समृद्धि का रास्ता गांवों के खेतों एवं खलिहानों से होकर गुजरता है"- चौधरी चरण सिंह ऐसा कहते थे. उनका कहना था कि भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं है. चाहे कोई भी लीडर आ जाए, चाहे कितना ही अच्छा कार्यक्रम चलाओ, जिस देश के लोग भ्रष्ट होंगे वह देश कभी तरक्की नहीं कर सकता !
गांव की एक ढाणी में जन्मे चौधरी चरण सिंह गांव, गरीब व किसानों के तारणहार बने , उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन गांव के गरीबों के लिए समर्पित कर दिया. इसीलिए देश के लोग मानते रहे हैं कि "चौधरी चरण सिंह एक व्यक्ति नहीं, विचारधारा का नाम है !"

स्वतंत्रता सेनानी से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक बने चौधरी ने ही भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे पहले आवाज बुलंद की और आह्वान किया कि भ्रष्टाचार का अंत ही देश को आगे ले जा सकता है । चौधरी साहब बहुमुखी प्रतिभा के धनी और प्रगतिशील विचारधारा वाले व्यक्ति थे।
चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर,1902 को गाजियाबाद जिले के नूरपुर गांव में एक जाट परिवार में हुआ था । उन्होंने स्वाधीनता आंदोलन के समय राजनीति में प्रवेश किया । उनके पिता चौधरी मीर सिंह ने अपने नैतिक मूल्य विरासत में चरण सिंह को सौंपा था। चरण सिंह के जन्म के 6 वर्ष बाद चौधरी मीर सिंह सपरिवार नूरपुर से जानी खुर्द गांव आकर बस गए थे।

आगरा विश्वविद्यालय से कानून की शिक्षा लेकर सन् 1928 में चौधरी चरण सिंह ने गाजियाबाद में वकालत शुरू की।  वकालत जैसे व्यावसायिक पेशे में भी चौधरी चरण सिंह उन्हीं मुकदमों को स्वीकार करते थे, जिनमें मुवक्किल का पक्ष न्यायपूर्ण होता था। सन् 1929 में कांग्रेस के लाहौर अधिवेशन के 'पूर्ण स्वराज्य' उद्घोष से प्रभावित होकर युवा चरण सिंह ने गाजियाबाद में कांग्रेस कमेटी का गठन किया।
सन् 1930 में महात्मा गांधी के चलाए सविनय अवज्ञा आंदोलन में शामिल होकर उन्होंने नमक कानून तोड़ने को डांडी मार्च किया। आजादी के दीवाने चरण सिंह ने गाजियाबाद की सीमा पर बहने वाली हिंडन नदी पर नमक बनाया। इस कारण चरण सिंह को 6 माह कैद की सजा हुई , जेल से वापसी के बाद चरण सिंह ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वयं को पूरी तरह से स्वतंत्रता संग्राम में समर्पित कर दिया।
सन् 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में भी चरण सिंह गिरफ्तार हुए, फिर अक्टूबर, 1941 में मुक्त किए गए। 9 अगस्त, 1942 को अगस्त क्रांति के माहौल में युवा चरण सिंह ने भूमिगत होकर गुप्त क्रांतिकारी संगठन तैयार किया। मेरठ कमिश्नरी में युवक चरण सिंह ने क्रांतिकारी साथियों के साथ मिलकर अंग्रेजी हुकूमत को बार-बार चुनौती दी , मेरठ प्रशासन ने चरण सिंह को देखते ही गोली मारने का आदेश दे रखा था।
एक तरफ पुलिस चरण सिंह की टोह लेती थी, वहीं दूसरी तरफ देशभक्त युवा स्वतंत्रता सेनानी चौधरी  चरण सिंह जनता के बीच सभाएं करके निकल जाता था । आखिरकार पुलिस ने एक दिन चरण सिंह को गिरफ्तार कर ही लिया , राजबंदी के रूप में डेढ़ वर्ष की सजा हुई , जेल में ही चौधरी चरण सिंह की लिखित पुस्तक " शिष्टाचार ", भारतीय संस्कृति और समाज के शिष्टाचार के नियमों का एक बहुमूल्य दस्तावेज है.

चौधरी चरण सिंह किसानों के नेता माने जाते रहे हैं। उनके द्वारा तैयार किया गया जमींदारी उन्मूलन विधेयक राज्य के कल्याणकारी सिद्धांत पर आधारित था. एक जुलाई, 1952 को उत्तर प्रदेश में उनके बदौलत जमींदारी प्रथा का उन्मूलन हुआ और गरीबों को अधिकार मिला।
किसानों के हित में उन्होंने 1954 में उत्तर प्रदेश भूमि संरक्षण कानून को पारित कराया। कांग्रेस में उनकी छवि एक कुशल नेता के रूप में स्थापित हुई। देश की आजादी के बाद वह राष्ट्रीय स्तर के नेता तो नहीं बन सके, लेकिन राज्य विधानसभा में उनका प्रभाव स्पष्ट महसूस किया जाता था. आजादी के बाद 1952, 1962 और 1967 में हुए चुनावों में चौधरी चरण सिंह राज्य विधानसभा के लिए फिर चुने गए।

चौधरी चरण सिंह का राजनीतिक भविष्य सन् 1951 में बनना शुरू हो गया था, जब इन्हें उत्तर प्रदेश में कैबिनेट मंत्री का पद प्राप्त हुआ. उन्होंने न्याय एवं सूचना विभाग संभाला। सन् 1952 में डॉ. संपूर्णानंद के मुख्यमंत्रित्व काल में उन्हें राजस्व तथा कृषि विभाग का दायित्व मिला। वह जमीन से जुड़े नेता थे और कृषि विभाग उन्हें विशिष्ट रूप से पसंद था। चरण सिंह स्वभाव से भी कृषक थे. वह कृषक हितों के लिए अनवरत प्रयास करते रहे।

सन् 1960 में चंद्रभानु गुप्ता की सरकार में उन्हें गृह तथा कृषि मंत्रालय दिया गया। वह उत्तर प्रदेश की जनता के बीच अत्यंत लोकप्रिय थे, इसीलिए प्रदेश सरकार में योग्यता एवं अनुभव के कारण उन्हें ऊंचा मुकाम हासिल हुआ।

उत्तर प्रदेश के किसान चरण सिंह को अपना मसीहा मानने लगे थे। उन्होंने कृषकों के कल्याण के लिए काफी कार्य किए, समस्त उत्तर प्रदेश में भ्रमण करते हुए कृषकों की समस्याओं का समाधान करने का प्रयास किया।  उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में कृषि मुख्य व्यवसाय था, कृषकों में सम्मान होने के कारण इन्हें किसी भी चुनाव में हार का मुंह नहीं देखना पड़ा।

चरण सिंह की ईमानदाराना कोशिशों की सदैव सराहना हुई। वह लोगों के लिए एक राजनीतिज्ञ से ज्यादा सामाजिक कार्यकर्ता थे, उन्हें भाषणकला में भी महारत हासिल थी यही कारण था कि उनकी जनसभाओं में भारी भीड़ जुटा करती थी।

चौधरी साहब 3 अप्रैल, 1967 में पहली बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, तब उनकी निर्णायक प्रशासनिक क्षमता की धमक और जनता का उन पर भरोसा ही था कि सन् 1967 में पूरे देश दंगे होने के बावजूद उत्तर प्रदेश में कहीं पत्ता भी नहीं खड़का। 17 अप्रैल, 1968 को उन्होंने मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। मध्यावधि चुनाव में उन्होंने अच्छी सफलता मिली और दोबारा 17 फरवरी, 1970 को वह मुख्यमंत्री बने। उन्होंने अपने सिद्धांतों व मर्यादित आचरण से कभी समझौता नहीं किया।

सन् 1977 में चुनाव के बाद जब केंद्र में जनता पार्टी सत्ता में आई तो किंग मेकर जयप्रकाश नारायण के सहयोग से मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने और चरण सिंह को देश का गृहमंत्री बनाया गया। केंद्र सरकार में गृहमंत्री बने तो उन्होंने मंडल व अल्पसंख्यक आयोग की स्थापना की।

सन् 1979 में वित्तमंत्री और उपप्रधानमंत्री के रूप में चोधरी साहब ने राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना की, बाद में मोरारजी देसाई और चरण सिंह के बीच मतभेद हो गया। 28 जुलाई, 1979 को चौधरी चरण सिंह समाजवादी पार्टियों तथा कांग्रेस (यू) के सहयोग से भारत के पांचवें प्रधानमंत्री बने। चौधरी चरण सिंह का प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल 28 जुलाई, 1979 से 14 जनवरी, 1980 तक रहा!!

चौधरी चरण सिंह एक कुशल लेखक भी थे, उनका अंग्रेजी भाषा पर अच्छा अधिकार था. उन्होंने 'अबॉलिशन ऑफ जमींदारी', 'लिजेंड प्रोपराइटरशिप' और 'इंडियाज पोवर्टी एंड इट्स सोल्यूशंस' नामक पुस्तकों का लेखन भी किया। उनमें देश के प्रति वफादारी का भाव था।।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गांधी टोपी को कई बड़े नेताओं ने त्याग दिया था, लेकिन चौधरी चरण सिंह इसे जीवन र्पयत धारण किए रहे. देश के इतिहास में उनका नाम प्रधानमंत्री से ज्यादा एक किसान नेता के रूप में जाना जाता है।

वर्ष 2001 में केंद्र की अटल बिहारी बाजपेयी सरकार द्वारा किसान दिवस की घोषणा की गई, जिसके लिए चौधरी चरण सिंह जयंती से अच्छा मौका नहीं था. उनके किए कार्यो को ध्यान में रखते हुए 23 दिसंबर को भारतीय किसान दिवस की घोषणा की गई, तभी से देश में प्रतिवर्ष किसान दिवस के रूप में मनाया जाता है। 29 मई, 1987 को 84 वर्ष की उम्र में जनमानस का यह नेता इस दुनिया को छोड़कर चला गया।

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने जो किसान व राष्ट्र हित में कार्य किये उनका योगदान सदियों सदियों तक याद रहेगा ।।
चौधरी साहब के जीवन दर्शन को लिखने का प्रयास किया है ताकि उनकी विचारधारा को आमजन तक पहुंचा सकू......
चौधरी चरणसिंह अमर रहे !!
चौधरी चरणसिंह अमर रहे !!
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© लेखक
कुलदीप रियाड़
Written by
Kuldeep riyar

Friday, 21 December 2018

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के जीवन की यादें

किसान मसीहा पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जी             

पुरानी यादें.....

एक दिन सुबह सुबह उठकर चौधरी चरण सिंह अपने ड्राईवर को बोले, चलो गाड़ी लेकर आओ। आज कही घूमने चलते हैं। चौधरी साहब गाड़ी मे बैठ कर चल दिए तभी ड्राईवर ने पूछा कि कहाँ जाना हैं? तो उन्होंने बोला तुम चलते रहो मै रास्ता अपने आप बता दूंगा।

ऐसे चलते चलते चौधरी साहब एक खेत मे पहुँच गए और ड्राईवर को बोले गाड़ी रोक दो। आज मै तुम्हें देश के अन्नदाता से मिलवाता हूँ।

उन्होंने देखा दो किसान काम करके खाना खाने के लिए बैठे ही थे, उन्होंने भी चौधरी साहब को भी अपनी और आते देख लिया था तो उन्होंने अपना खाना बंद करके ऱख दिया। और चौधरी साहब की सेवा मे लग गए।

तभी चौधरी साहब ने बोला रोटी नहीं आई क्या ? दोनों ने एक दूसरे की तरफ देखा और बोले नहीं आई।

एक ने कहा अभी लाते हैं गांव से।

तभी चौधरी साहब ने कहा रोटी तो आई हुई हैं वो ही ले आओ। दोनों भाई एक दूसरे की तरफ देखने लगे तभी चौधरी साहब ने अपने ड्राईवर को बोला कि तुम ले आओ ट्यूबवेल से खाना, वो खाना ले आया और चौधरी साहब खाना खाने लगे
तभी चौधरी साहब ने बोला गुड़ नहीं हैं क्या?

तो किसान बोला नहीं चौधरी साहब लड़की को बालक हुआ था गुड़ बेच कर उसका छुचक दे दिया।

तभी चौधरी साहब ने अपने ड्राईवर से बोला ये हालात हैं भारत के  किसान के। जो गुड़ पैदा कर रहा हैं आज उसके पास खाने के लिए गुड़ नहीं हैं।

ऐसे किसान मसीहा को मै कोटि कोटि नमन करता हूँ जिन्होंने अपना पूरा जीवन किसान हित के लिए लगा दिया।

" भारत के पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह ने कहा था देश की तरक्की का रास्ता खेत खलिहान से हो कर गुजरता है। "

लेकिन आज किसान की बदहाली का रास्ता भी खेत खलिहान से ही गुजरता हैं किसानो के हालात बद से बदत्तर हो गए हैं किसानो को फसलों के वाजिब दाम नहीं मिल रहे हैं । किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं।
एक बार वापस आ जाओ चौधरी साहब .....

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©
लेखक
कुलदीप रियाड़
Written by
Kuldeep riyar

Thursday, 6 December 2018

मताधिकार का प्रयोग जरूर करें

पहले मनन, फिर अगर कर सको तो ध्यान और फिर मताधिकार का प्रयोग !

🔔  मताधिकार की पूर्व संध्या पर यह चौंकाने वाली विडंबना का संदेश जरूर पढ़ें तथा समय निकालकर राष्ट्रहित में चिंतन अवश्य करें,
अपने महत्व को जानिये।

🙏

मान लो भारत की जनसंख्या 1000 है।

1. उसमें से कुल मतदाता लगभग
65% = 650 हुए।

2. सामान्यतः 53% ही मताधिकार का प्रयोग करते हैं।
अतः 345 लोगों ने वोट डाला और
305 लोगों ने वोट नहीं दिया।

3. कुल वोटिंग का 45% वोट पाने वाली पार्टी सत्ता प्राप्त कर लेती है।
अर्थात 345 का 45%= 155 लोगों की इच्छा से (15.5 प्रतिशत से) सरकार  बन जाती है।

4. जो लोग वोट नहीं देते उसमे 95% लोग बुद्धिजीवी वर्ग के होते हैं।
305 का 95%= 290 लोग।

5. ये 290 लोग ही सही आकलन करना जानते हैं,
कि वर्तमान परिस्थितियों में कौन सी पार्टी या नेता की आवश्यकता देश को है।

6. यदि ये 290 लोग
(29 प्रतिशत) चाहें,
तो देश को सही सरकार या सही नेतृत्व उपलब्ध करा सकते हैं।
परन्तु इनकी चुप्पी या चुनाव में मताधिकार प्रयोग ना करने की उदासीनता का खामियाजा देश ने आधी शताब्दी से ज्यादा समय तक भोगा है।
जिसके लिए उनकी पीढ़ियाँ क्या उन्हें माफ करेंगी!!!!

इस वर्ग से मेरा निवेदन--
वफाये वतन की,
इतनी ही रुसवाई है|
लम्हों ने खता की थी,
सदियों ने सजा पाई है

अतः अपने लिए ना सही, अपनी पीढ़ियों के लिए इस बार वोट अवश्य डालना। क्योंकि आप 29 प्रतिशत हैं; जो कि अभी तक बन रही सरकारों (15.5% से बनी सरकार) की तुलना में लगभग दुगने हैं।

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कुलदीप रियाड़
Kuldeep riyar
7 दिसम्बर अपने मताधिकार का प्रयोग जरूर करे
✌️✌️✌️✌️✌️✌️✌️✌️✌️

Tuesday, 23 October 2018

मुहूर्त का समय : कुलदीप रियाड़ Auspicious beginning time : Kuldeep riyar

                      ।।मुहूर्त का समय।।
जिस दिन जिस वक्त  हमारा जन्म हुआ वही दिन और समय हमारे लिए शुभ है।

जन्म मरण के संदर्भ मे:-

जन्म लेते समय कभी मुहूर्त नही देखा जाता और मरने के लिए भी कोई मुहूर्त नही देखा जाता फिर भी जिंदगी में मुहूर्त देखा जाता है।
शुभ मुहूर्त में जन्मा बच्चा सदैव वैज्ञानिक, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, उधोगपति ही होगा क्या?
जैसे किसी सम्पन व्यक्ति अम्बानी , बिल गेट्स के जन्म के मुहूर्त में पैदा हए सारे बच्चे बिल गेट्स या अम्बानी बने क्या?
मेरे हिसाब से सभी दिन औऱ सभी समय शुभ है हमारे लिए, सभी दिन व समय शुभ ही तो है।

सामाजिक क्षेत्र:-

कुंडलिया देखकर विवाह का मुहूर्त निकाला जाता है फिर भी अनेक महिलाएं विधवा और पुरूष विधुर होते हैं।
पत्रिका और कुंडली जोड़कर हुए जोड़ो का तलाक और कुछ की अकाल मृत्यु क्यों होती है, ऐसा क्यों?
मेरे अनुसार जैसे वर्ष में होने वाले 95 % विवाह मुहूर्त के समय नही होते फिर भी मुहूर्त का आग्रह किसलिए?

राजनीतिक क्षेत्र :-

मुहूर्त देखकर चुनाव में खड़े होने वाले उम्मीदवार में से एक ही विजयी होता है , शेष सभी हारते है, ऐसा क्यों होता है? या फिर सिर्फ एक का ही मुहूर्त शुभ होता है क्या !
जैसे किसी मंत्री पद की शपथ ग्रहण , मंत्रालय में कार्यभार संभालने का मुहूर्त , कुर्सी पर बैठने का मुहूर्त सबका शुभ मुहूर्त देखा जाता है फिर भी यह पद अल्पकालीन क्यों हो जाता हैं?

नवीन प्रतिष्ठान के शुभारंभ के संदर्भ में:-

उच्च शिक्षित डॉक्टर, इंजीनियर , उद्योगपति अपने प्रतिष्ठान का उदगाटन करते समय मुहूर्त देखकर ही शुरुआत करते है , फिर भी कितनो को अपयश मिलता है, व्यवसाय सफल नही होता उनको उस क्षेत्र को छोड़कर भागना पड़ता है , ऐसा क्यों?

मेरे अनुसार अपने आप पर व अपने कर्मो पर विश्वास रखे , अगर आपका मन निर्मल होगा और प्रयास करने की क्षमता होगी तो  आपको यशस्वी होने से कोई मुहूर्त का समय रोक नही सकता। इसलिए आज व अभी से शुभ अशुभ मुहूर्त में न पड़ते हुए वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं  और अपना व दूसरो का समय बर्बाद न करते हुए कर्मयोगी,  परिश्रमी , मेहनतकश , यशस्वी  बने ।।
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लेखक
कुलदीप रियाड़
©2018
नोट:- यह विचार स्वयं के है तथा मेरा उद्देश्य इस लेख के माध्यम से किसी की भावना आहत करना नही है ।
सादर
कुलदीप रियाड़

Sunday, 21 October 2018

हरिवंश राय बच्चन जी की कविता "अमृतसर रेल हादसा" पर सटीक कविता

अमृतसर में  रावण पुतला दहन के दौरान  हुए  रेल हादसे पर सटीक बैठती यह कविता "हरिवंश राय बच्चन जी "
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ना दिवाली होती, और ना पठाखे बजते

ना ईद की अलामत, ना बकरे शहीद होते
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,

…….काश कोई धर्म ना होता....

…….काश कोई मजहब ना होता....
ना अर्ध देते, ना स्नान होता

ना मुर्दे बहाए जाते, ना विसर्जन होता
जब भी प्यास लगती, नदीओं का पानी पीते

पेड़ों की छाव होती, नदीओं का गर्जन होता
ना भगवानों की लीला होती, ना अवतारों

का नाटक होता

ना देशों की सीमा होती , ना दिलों का

फाटक होता
ना कोई झुठा काजी होता, ना लफंगा साधु होता

ईन्सानीयत के दरबार मे, सबका भला होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता,

…….काश कोई धर्म ना होता.....

…….काश कोई मजहब ना होता....
कोई मस्जिद ना होती, कोई मंदिर ना होता

कोई दलित ना होता, कोई काफ़िर ना

होता
कोई बेबस ना होता, कोई बेघर ना होता

किसी के दर्द से कोई बेखबर ना होता
ना ही गीता होती , और ना कुरान होती,

ना ही अल्लाह होता, ना भगवान होता
तुझको जो जख्म होता, मेरा दिल तड़पता.

ना मैं हिन्दू होता, ना तू भी मुसलमान होता
तू भी इन्सान होता, मैं भी इन्सान होता।
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लेखक
हरिवंशराय बच्चन
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संकलन कर्ता
कुलदीप रियाड़

Wednesday, 10 October 2018

देश की अमूल्य धरोहर : हमारे वरिष्ठ नागरिक (बुजुर्ग)

एक बुजुर्ग आदमी था। उसके तीन बेटे थे। उनमें से सबसे बड़ा बेटा अपने पिता का सबसे ज्यादा ख्याल या उनकी देखरेख करता था,उससे छोटे वाला थोड़ी कम देखरेख करता और सबसे छोटे वाला ना के बराबर देखभाल करता था। एक दिन वह बुड्ढा आदमी बीमार पड़ गया तो उसने अपने तीनों बेटों को अपने पास बुलाया और उसके पास कुल 17 ऊँट थे।  उस बीमार व्यक्ति ने अपने तीनों बेटों से कहा कि आप तीनों इन कुल ऊँटो का आपस में बंटवारा इस प्रकार कर लेना की सबसे बड़े बेटे को कुल ऊँटो का 1/2 हिस्सा दे देना तथा उससे छोटे वाले बेटे को कुल का 1/3 हिस्सा दे देना तथा सबसे छोटे वाले बेटे को कुल का 1/9  हिस्सा दे देना। वह बुड्ढा आदमी मर जाता है और उसके बेटों में इस बंटवारे को लेकर आपसी झगड़ा शुरू हो जाता है क्योंकि कुल 17 ऊँटो का बंटवारा किसी भी प्रकार से पूरा नहीं हो पा रहा था। वह आपस में झगड़ते रे और तीनों कोर्ट में चले गए। कोर्ट में जैसा की आप सबको मालूम है कि हमेशा तारीखों पर तारीख के दी जाती है और केस को लंबा खींचा जाता है। इससे धन और समय दोनों की हानि होती है। जब यह बात गांव में किसी बुजुर्ग को पता चलती की उस बुड्ढे आदमी के तीनों बेटे आपसी बंटवारे को लेकर कोर्ट में झगड़ रहे हैं।  वह बुड्ढा आदमी उन तीनों लड़कों को अपने पास बिठाता है और बोलता है कि आप यह मेरा एक ऊँट ले लो और आपसी लड़ाई को छोड़ दो। अब उन तीनों के पास कुल 18 ऊंट हो जाते हैं और उनका आपसी बंटवारे का समीकरण सही से बैठ भी जाता है। जैसा कि उस समीकरण के हिसाब से सबसे बड़े वाले बेटे को कुल ऊँटो का 1/2 यानि 18/2=9 ऊँट पहले वाले को मिलता है। उससे छोटे वाले बेटे को कुल ऊँटो का 1/3 यानि 18/3 = 6 ऊँट मिलते हैं तथा सबसे छोटे वाले को कुल ऊँटो का 1/9 यानि 18/9=2 ऊँट मिलते हैं। अब पहले दूसरे और तीसरे तीनों के बंटवारे के ऊंटों का समीकरण मिलाते हैं पहले को 9 दूसरे को 6 तथा तीसरे को 2 ऊँट मिलते हैं। अब तीनों को आपसे में जोड़ते हैं 9+6+2=17 होता है और वह बुड्ढा आदमी अपना ऊँट वापस लेकर चला जाता है। कहने का मतलब यह है कि अगर आपको कोई एक सही दिशा दे सकता है तो आपका जीवन बदल सकता है!   

इंसान बनने का प्रयास कीजिये,

अमीर तो कोई भी बन सकता है

जीवन में ऊँचे उठते समय, लोगों से सद्व्यवहार रखें।

क्योंकि हो सकता है की अगर आपको नीचे आना पड़ा तो सामना इन्हीं लोगों से होगा।

जीवन का सारांश यही है
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जहां बुजुर्गों के बताये उसूल चलते है
वहां संस्कार खत्म नही होते.....
पुराना पैड अगर फल नही देता है
तो छाया तो.जरूर देगा..
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Kuldeep riyar


Wednesday, 12 September 2018

छात्र संघ चुनाव , जातीय विभाजन , मानवता , युवा

छात्र संघ चुनाव & जातीय विभाजन & मानवता & युवा
✍️
छात्र संघ चुनाव नतीजों के बाद लोगों की प्रतिक्रिया देखी , कमेंट पढ़े कि यहां से जाट जीत गया वहां से राजपूत जीत गया उधर दलित जीत गया । इन सब प्रतिक्रियाओं से एक बात समझ मे नहीं आई कि कहीं से कोई नेक इंसान क्यों नहीं जीत पाया ????🤔🤔
इंसानियत कहाँ चली गई हारकर ....??🤔
कहीं से कोई छात्र क्यों नहीं जीत पाया.....??🤔
यह जातियां चुनाव कैसे जीतने लग गई...???🤔🤔
विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते एक बात समझ पाया हूँ कि नेताओं की कोई जाति नहीं होती बल्कि उनका एक वर्ग होता है नेता वर्ग ।
इस वर्ग में सभी धर्म , जाति व सम्प्रदाय के नेता आ जाते हैं । इस वर्ग के लोगों का अपनी जाति से जुड़ाव वोट लेने तक ही सीमित रहता है ।
पुराने लोग कहते थे (हैं ?) कि रोटी बेटी का रिश्ता जाति में होना चाहिये । इस वर्ग का इतिहास देखिये सब समझ आ जायेगा ।
हम सब भारतीय है हमें किसी जाति के लिये आपस में नहीं लड़ना है । आग , बाढ़, भूकम्प आदि आपदाओं ने कभी जाति देखकर बचाव नहीं किया इनमे सभी जातियों के लोग मारे गए हैं ।
"यह जातिगत लड़ाई भी एक राष्ट्रीय आपदा है इससे बचे"               
सादर
✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️
कुलदीप रियाड़

 

Saturday, 8 September 2018

Delhi diary यात्रा वृतांत by Kuldeep Riyar

                           Delhi diary

                            यात्रा वृतांत

कल शाम को नई दिल्ली मे एक होटल पर डिनर करने गया,

वहा एक छोटा सा लडका था जो ग्राहको को खाना खिला रहा था।
कोई ऐ छोटू कह कर बुलाता तो कोई ओए छोटू वो नन्ही सी जान ग्राहको के बीच जैसे उलझ कर रह गयी हो ।
यह सब मेरे मन को काट रहा था ।
मैने छोटू को "छोटू जी" कहकर अपनी
तरफ बुलाया ।
वह भी प्यारी सी मुस्कान
लिये मेरे पास आकर बोला,"साहबजी क्या खाओगे ?

"मैने कहा,"साहब नही भैया बोल ! तब ही बताऊगाँ ।"

वो भी मुस्कुराया और आदर के साथ बोला,

भैया जी आप क्या खाओगे?

मैने खाना आर्डर किया और खाने लगा ।

छोटू जी के लिये अब मे ग्राहक से जैसे मेहमान बन  चुका था ।
वो मेरी एक आवाज पर दौडा चला आता और प्यार से
पूछता,
"भैया  जी और क्या लाये, खाना अच्छा तो लगा ना
आपको???
"और मै कहता,"
हाँ छोटू जी !
आपके इस प्यार ने खाना और स्वादिष्ट कर दिया ।

"खाना खाने के बाद मैने बिल चुकाया और 100 रू छोटूजी की हाथ पर रख,

"कहा ये तुम्हारे है, रख लो और अपने मालिक से मत कहना है।

"वो खुश होकर बोला,"

जी भैया  

"फिर मैने पुछा,"

क्या करोगे इन पैसो का ।

"वो खुशी से बोला,"

आज माँ के लिये चप्पल ले जाऊगाँ, 4 दिन से माँ के पास चप्पल नही है, नँगे पैर ही चली।।

मेने पूछा क्या करती है माँ आपकी

"जाती है साहब लोग के यहाँ बर्तन माझने ।"

उसकी ये बात सुन मेरी आँखे भर आयी । 

मैने पुछा,

"घर पर कौन कौन है ??"

तो बोला,"

माँ है, मै और छोटी बहन है, पापा भगवान के पास चले गये सात महीने पहले ।"

मेरे पास कहने को अब कुछ नही रह गया था । मैने व मेरे भाई ने उसको कुछ पैसे और दिये और बोला,"आज सेव ले जाना माँ के लिये और माँ के लिये अच्छी सी चप्पल लाकर देना और बहन औरअपने लिये आईसक्रीम ले जाना और अगर माँ पुछे किसने दिया तो कह देना पापा के दोस्त थे एक भैया  वो दे गये ।

"इतना सुन छोटू मुझसे लिपट गया" 

वास्तव में छोटू अपने घर का बड़ा निकला ।
पढाई की उम्र मे घर का बोझ उठा रहा है।

ऐसे ही ना जाने कितने ही छोटू आपको होटल, ढाबो या चाय की दुकान पर काम करतेमिल जायेगे । आप सभी से इतना निवेदन है उनको नौकर की तरह ना बुलाये,थोडा प्यार से कहे।।

खाना बेचता हैं सबके के पास जा - जा कर...

उम्र जिसकी खुद किताबें  खरीदने की है!!

#मजबूर बचपन

#दिल्ली की यात्रा

#DelhiTrip

#SaveChildhood

©2018

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 Kuldeep riyar

अंत मे सिर्फ इतना लिखूंगा 

हे खुदा !

मेरी किस्मत में तू लिख तो सही एक दिन मेरी मर्जी का

हर गरीब का सहारा बन जाऊंगा ।।





Thursday, 23 August 2018

सोशल मीडिया का वर्तमान संदर्भ में उपयोग

सोशल मीडिया के माध्यम से समय व धन की बचत करके राष्ट्र को मजबूत कैसे कर सकते??
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👉 फ्री में बैलेंस, मोबाइल, पेनड्राइव, टीशर्ट आदि के लिए मैसेज भेजना बन्द करें।
👉2-2 साल पुराने मैसेज को मार्किट में नया है कहकर फारवर्ड करते रहते हैं। जैसे फलां जगह बच्ची मिली है इसे घर वालों तक पहुंचाओ। इनमें तारीख़ नहीं होती। तारीख़ होती तो पोल खुल जाती।ऐसे मैसेज भेजना बन्द करें।
👉 ऐसे एक्सीडेंट की खबरे भेजते हैं, जो 2 साल पहले हुआ था। इनमें भी तारीख़ कभी नहीं होती।ऐसे मैसेज कभी किसी को नहीं भेजे।
👉 देवी देवताओं की फ़ोटो या नाम लिखकर कसम देकर लोगों को फारवर्ड करके अपनी बला ग्रुप के मेम्बरों पर चिपकाते हैं।अगर देवी देवताओं की फ़ोटो भेजने व नाम लिखने से किसी का भला होता तो किसी को काम करने की जरूरत ही नहीं थी।घर बैठे बैठे यही काम करते।
👉 "पुजारी मंदिर में पूजा कर रहा था फिर एक सांप/बन्दर आया और उसने इंसान का रूप ले लिया" इसे आगे भेजो लाटरी निकल जायेगी।ऐसे मैसेज किसी को मत भेजो कोई फायदा नहीं है।
👉 अभी अभी पैदा हुए बच्चे के गले में आलपिन फंस गई, ओपरेशन के 50 लाख लगेंगे।कौनसे ऑपरेशन में 50 लाख लगते हैं भाई ?  ऊपर से बोलेंगे कि प्रति शेयर 50 पैसा व्हाट्सऐप की तरफ से मिलेगा। जबकि सच्चाई ये है कि किसी को कुछ नहीं मिलता है।
👉सबसे बड़ी बेवकूफी तो तब होती है जब कोई कहता है कि- "मैसेज आगे भेजो आपकी बैटरी फुल चार्ज हो जायगी", घोडा दौड़ने लगेगा, भैंस का रंग बदल जायेगा या  ताला खुल जायेगा।ऐसे मैसेज भेजने वाले लोग देश व समाज का कभी भला नहीं कर सकते।
👉 किसी आदमी के डॉक्यूमेंट, डिग्रियाँ गिर गए हैं, ये मैसेज उस तक पहुचाने में मदद करें.ऐसे मेसेज डॉक्यूमेंट मिलने के बाद छः छः महीने तक चलते हैं।
👉अगर हमें समाज को मजबूत करना है तो समय व धन दोनों की बचत करनी होगी।ऐसे मैसेज हमारे समय व धन दोनों को बर्बाद कर रहे हैं।सबसे बड़ा नुकसान तो यह होता है कि ऐसे मैसेजों से कई काम के मैसेज नहीं पढ़ पाते हैं।
👉याद रखो दुनियां में सब से कीमती समय है और हमारी वजह से किसी इंसान का एक सेकंड भी बर्बाद होता है तो हम उस व्यक्ति के गुनहगार है।अपना समय व धन बर्बाद करो आपको कोई नहीं रोकेगा क्योकि हम किसी की मानते नहीं है बाकी लोग सावधान तो करते हैं।लेकिन ऐसे बिना काम के कॉपीपेस्ट मैसेजों से दूसरों का धन व समय बर्बाद करने का अधिकार भी हमें नहीं है।
👉जिसके दिल में देश समाज व वर्तमान में गिरते मानवीय मूल्य के प्रति दर्द है वो मेरी बात पर घोर करें।जिनको किसी से कोई मतलब नहीं वो अपना काम जारी रखे।
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कुलदीप रियाड़
Kuldeep riyar