Friday, 27 December 2019

Inspiration from hawk 's life : Kuldeep Riyar बाज के जीवन से प्रेरणा : कुलदीप रियाड़

Inspiration from hawk 's life : Kuldeep Riyar
बाज के जीवन से प्रेरणा : कुलदीप रियाड़


"बाज़" ऐसा पक्षी  है। जिस उम्र में बाकी परिंदों के बच्चे चिचियाना सीखते है उस उम्र में एक मादा बाज अपने चूजे को पंजे में दबोच कर सबसे ऊंचा उड़ जाती है। पक्षियों की दुनिया में ऐसी Tough and tight training किसी भी ओर की नही होती। मादा बाज अपने चूजे को लेकर लगभग 12 Km. ऊपर ले जाती है। जितने ऊपर आधुनिक जहाज उड़ा करते हैं और वह दूरी तय करने में मादा बाज 7 से 9 मिनट का समय लेती है।

यहां से शुरू होती है उस नन्हें चूजे की कठिन परीक्षा। उसे अब यहां बताया जाएगा कि तू किस लिए पैदा हुआ है? तेरी दुनिया क्या है? तेरी ऊंचाई क्या है? तेरा धर्म बहुत ऊंचा है और फिर मादा बाज उसे अपने पंजों से छोड़ देती है।
धरती की ओर ऊपर से नीचे आते वक्त लगभग 2 Km. उस चूजे को आभास ही नहीं होता कि उसके साथ क्या हो रहा है। 7 Km. के अंतराल के आने के बाद उस चूजे के पंख जो कंजाइन से जकड़े होते है, वह खुलने लगते है। लगभग 9 Km. आने के बाद उनके पंख पूरे खुल जाते है। यह जीवन का पहला दौर होता है जब बाज का बच्चा पंख फड़फड़ाता है। अब धरती से वह लगभग 3000 मीटर दूर है लेकिन अभी वह उड़ना नहीं सीख पाया है। अब धरती के बिल्कुल करीब आता है जहां से वह देख सकता है उसके स्वामित्व को। अब उसकी दूरी धरती से महज 700/800 मीटर होती है लेकिन उसका पंख अभी इतना मजबूत नहीं हुआ है की वो उड़ सके।
धरती से लगभग 400/500 मीटर दूरी पर उसे अब लगता है कि उसके जीवन की शायद अंतिम यात्रा है। फिर अचानक से एक पंजा उसे आकर अपनी गिरफ्त मे लेता है और अपने पंखों के दरमियान समा लेता है। यह पंजा उसकी मां का होता है जो ठीक उसके उपर चिपक कर उड़ रही होती है। और उसकी यह ट्रेनिंग निरंतर चलती रहती है जब तक कि वह उड़ना नहीं सीख जाता।
यह ट्रेनिंग एक कमांडो की तरह होती है। तब जाकर दुनिया को एक बाज़ मिलता है अपने से दस गुना अधिक वजनी प्राणी का भी शिकार करता है।
हिंदी में एक कहावत है... "बाज़ के बच्चे मुँडेर पर नही उड़ते।"

बेशक अपने बच्चों को अपने से चिपका कर रखिए पर उसे दुनियां की मुश्किलों से रूबरू कराइए, उन्हें लड़ना सिखाइए। बिना आवश्यकता के भी संघर्ष करना सिखाइए। वर्तमान समय की अनन्त सुख सुविधाओं की आदत व अभिवावकों के बेहिसाब लाड़ प्यार ने मिलकर, आपके बच्चों को "ब्रायलर मुर्गे" जैसा बना दिया है जिसके पास मजबूत टंगड़ी तो है पर चल नही सकता वजनदार पंख तो है पर उड़ नही सकता क्योंकि "गमले के पौधे और जंगल के पौधे में बहुत फ़र्क होता है।"


कुलदीप रियाड़
Kuldeep Riyar



Monday, 21 October 2019

क्रान्तिकारी अमर शहीद अशफाकुल्लाह ख़ाँ की जयंती पर कोटि कोटि नमन : कुलदीप रियाड़

क्रान्तिकारी, अमर शहीद अशफाकुल्लाह ख़ाँ की जयंती पर नमन 
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काकोरी के शहीद अशफाकुल्लाह खां भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी सेनानी और 'हसरत' उपनाम से उर्दू के एक अज़ीम शायर थे। उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शहर शाहजहांपुर में जन्मे अशफाक ने किशोरावस्था में अपने ही शहर के क्रांतिकारी शायर राम प्रसाद बिस्मिल के व्यक्तित्व और विचारों से प्रभावित होकर अपना जीवन वतन की आज़ादी के लिए समर्पित कर दिया था। वे क्रांतिकारियों के उस जत्थे के सदस्य बने जिसमें पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद, मन्मथनाथ गुप्त, राजेंद्र लाहिड़ी, शचीन्द्रनाथ बख्सी, ठाकुर रोशन सिंह, केशव चक्रवर्ती, बनवारी लाल, मुकुंदी लाल जैसे लोग शामिल थे। चौरी चौरा की हिंसक घटना के बाद महात्मा गांधी द्वारा असहयोग आंदोलन वापस लेने के फ़ैसले से इस जत्थे को बेहद पीड़ा हुई थी। 8 अगस्त, 1925 को शाहजहांपुर में रामप्रसाद बिस्मिल और चन्द्रशेखर आज़ाद के नेतृत्व में इस क्रांतिकारी जत्थे की एक अहम बैठक हुई जिसमें अपने क्रांतिकारी अभियान हेतु हथियार खरीदने के लिए ट्रेन से सरकारी ख़ज़ाने को लूटने की योजना बनी। उनका मानना था कि यह वह धन अंग्रेजों का नहीं था, अंग्रेजों ने उसे भारतीयों से ही हड़पा था। 9 अगस्त, 1925 को अशफाकउल्ला खान और पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आठ क्रांतिकारियों के दल ने सहारनपुर-लखनऊ पैसेंजर ट्रेन से अंग्रेजों का खजाना लूट लिया।

अंग्रेजों को हिला देने वाले काकोरी षड्यंत्र के नाम से प्रसिद्द इस कांड में गिरफ्तारी के बाद जेल में अशफ़ाक़ को असह्य यातनाएं दी गईं। उन्हें धर्म के नाम पर भड़का कर सरकारी गवाह बनाने की कोशिशें हुईं। अंग्रेज अधिकारियों ने उनसे कहा कि हिन्दुस्तान आज़ाद हो भी गया तो उस पर मुस्लिमों का नहीं, हिन्दुओं का राज होगा और मुस्लिमों को कुछ भी नहीं मिलेगा। इसके जवाब में अशफ़ाक़ ने कहा था - 'तुम लोग हिन्दू-मुस्लिमों में फूट डालकर आज़ादी की लड़ाई को अब नहीं दबा सकते। हिन्दुस्तान आज़ाद होकर रहेगा। अपने दोस्तों के ख़िलाफ़ मैं सरकारी गवाह कभी नहीं बनूंगा।'

संक्षिप्त ट्रायल के बाद अशफ़ाक, राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी की सजा और बाकी लोगों को चार साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सज़ा सुनाई गई। अशफ़ाक को 19 दिसंबर, 1927 की सुबह फैज़ाबाद जेल में फांसी दी गई। फांसी के पहले जो हुआ वह अशफाक के व्यक्तित्व का आइना है। उन्होंने वजू कर कुरआन की कुछ आयतें पढ़ी, कुरआन को आंखों से लगाया और ख़ुद जाकर फांसी के मंच पर खड़े हो गए। वहां मौज़ूद जेल के अधिकारियों से उन्होंने कहा - 'मेरे हाथ इन्सानी खून से नहीं रंगे हैं। खुदा के यहां मेरा इन्साफ़ होगा।' उसके बाद उन्होंने अपने हाथों फांसी का फंदा अपने गले में डाला और झूल गए। यौमे पैदाईश (22 अक्टूबर) पर शहीद अशफ़ाक़ को कृतज्ञ राष्ट्र की श्रद्धांजलि, उनकी लिखी एक नज़्म के साथ !

जाऊंगा ख़ाली हाथ मगर,
यह दर्द साथ ही जाएगा
जाने किस दिन हिंदोस्तान
आज़ाद वतन कहलाएगा

बिस्मिल हिन्दू हैं, कहते हैं
फिर आऊंगा, फिर आऊंगा
फिर आकर ऐ भारत माता
तुझको आज़ाद कराऊंगा

जी करता है मैं भी कह दूं
पर मज़हब से बंध जाता हूं
मैं मुसलमान हूं पुनर्जन्म की
बात नहीं कर पाता हूं

हां ख़ुदा अगर मिल गया कहीं
अपनी झोली फैला दूंगा
और जन्नत के बदले उससे
एक पुनर्जन्म ही मांगूंगा !

क्रान्तिकारी,अमर शहीद अशफाकुल्लाह ख़ाँ को आज उनकी जयन्ती पर कोटि-कोटि नमन और सलाम...!
जय हिंद ! जय भारत !
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लेखक
कुलदीप रियाड़
Kuldeep riyar
      

Wednesday, 24 July 2019

देश की बेटी : हिमा दास ।। Country's daughter : Hima das ।। kuldeep riyar।।

                              देश की बेटी !

         यही लड़की अगर प्रियंका चोपड़ा, स्वरा भास्कर, या प्रिया प्रकाश होती तो सोशल मीडिया पर रातों-रात छा जाती...लेकिन जनाब यह तो एक गरीब किसान की बेटी है, जिसने फेसबुक या इंस्टाग्राम पर बिना डबल फिल्टर के, बिना नारीवादी कविता के अपनी फोटो अपलोड किए हुए भारत का नाम रोशन किया है...वह भी दो हफ्तों में 5 स्वर्ण पदक जीतकर...पर हैरानी की बात यह है कि अधिकतर लोगो को इसकी जानकारी तक नहीं है !

        धन्य है असम का वह धान उगाने वाला एक गरीब किसान परिवार, जिसने एक दृढ़ संकल्पित और जिद्दी खिलाड़ी भारत को दिया है...जिसके लिए यह मुल्क उनका कर्जदार रहेगा !

        उसके पास सप्लीमेंट और प्रोटीन कभी नहीं थे, वो सिर्फ दाल-चावल खाकर इस मुकाम तक पहुँची है...वह स्टेडियम के पक्के ट्रैक पर नहीं दौड़ पाई, क्योंकि उसके लिए तो खेतों के कच्चे रास्ते ही उसके अपने और अपने देश के सपने पूरे करने के लिए काफी थे...उसने कभी समाज, अपने माँ-बाप और परिस्थितियों को नहीं गलियाया, बल्कि अपने जुनून और हुनर से हालात को, जमाने को निरुत्तर कर अपना इकबाल बुलंद किया !

        जब उसने देश के लिए विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता, उसकी आँखें आँसुओं से भरी हुई थी, क्योंकि बैकग्राउंड में राष्ट्रीय गान चल रहा था...ये आँसूं गोल्ड मेडल के कारण नही थे; बल्कि ये आँसूं भारत का नाम रौशन करने के लिए थे, मुल्क के सम्मान में थे...इतना ही नहीं, उसके मन में मुल्क के लिए अपनापन और मिट्टी से जुड़ाव इतना गहरा है कि हाल ही में असम में आई बाढ से पीड़ितों के लिए अपने पदक की राशि भी दान कर दी !

इसे कहते हैं, देश की बिटिया ! स्वर्णपरी !

हमे आप पर गर्व है , और उम्मीद करता हूं कि #टोक्यो2020 ओलंपिक में भी आप अपने इस स्वर्णिम सफर को जारी रखे !

शुभकामनाओ के साथ
आपका अनुज
कुलदीप रियाड़
Kuldeep riyar




Wednesday, 29 May 2019

भारतीय राजनीति के वास्तविक चौधरी - चौधरी चरण सिंह


चौधरी का मतलब, जो हल की चऊँ को धरा पर चलाता है।

भारतीय राजीनीति के वास्तविक चौधरी , चौधरी चरण सिंह जी की 32 वी पुण्य तिथि पर कोटि कोटि नमन .....
चौधरी चरण सिंह जी मात्र एक भारतीय राजनीतिज्ञ एक किसान नेता एक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एक भूतपूर्व प्रधानमंत्री का नाम नही था बल्कि चौधरी चरण सिंह एक विचारधारा का भी नाम था।।

गाँव की एक फूस-मिट्टी की ढाणी में जन्मा एक बच्चा गाँव, गरीब व किसानों का तारणहार बना। गाँव व गरीब के लिये जीवन समर्पित कर दिया। उनका मसीहा बना। स्वतन्त्रता सेनानी से लेकर देश के सर्वोच्च पद प्रधानमंत्री तक बना। चौधरी चरण सिंह ने ही भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे पहले आवाज बुलंद की और आह्वान किया कि “भ्रष्टाचार का अंत ही, देश को आगे ले जा सकता है।”

बहुमुखी प्रतिभा के धनी  के पास संपति के नाम पर उनके पिता मीर सिंह से विरासत में मिले नैतिक मूल्यों के संस्कार थे।
चौधरी चरण सिंह के जीवन चरित्र के कुछ महत्वपूर्ण कथन......
✍️असली भारत गांवों में रहता है।
✍️अगर देश को उठाना है तो पुरुषार्थ करना होगा।
✍️राष्ट्र तभी संपन्न हो सकता है जब उसके ग्रामीण क्षेत्र का उन्नयन किया गया हो तथा ग्रामीण क्षेत्र की क्रय शक्ति अधिक हो।
✍️किसानों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होगी तब तक देश की प्रगति संभव नहीं है।
✍️किसानों की दशा सुधरेगी तो देश सुधरेगा।
✍️किसानों की क्रय शक्ति नहीं बढ़ती तब तक औधोगिक उत्पादों की खपत भी संभव नहीं है।
✍️भ्रष्टाचार की कोई सीमा नहीं है जिस देश के लोग भ्रष्ट होंगे वो देश कभी, चाहे कोई भी लीडर आ जाये, चाहे कितना ही अच्छा प्रोग्राम चलाओ … वो देश तरक्की नहीं कर सकता।
✍️चौधरी का मतलब, जो हल की चऊँ को धरा पर चलाता है।
हरिजन लोग, आदिवासी लोग, भूमिहीन लोग, बेरोजगार लोग या जिनके पास कम रोजगार है और अपने देश के 50% फीसदी किसान जिनके पास केवल 1 हैक्टेयर से कम जमीन है … इन सबकी तरफ सरकार विशेष ध्यान होगा
✍️सभी पिछड़ी जातियों, अनुसूचित जातियों, कमजोर वर्गों, अल्पसंख्यकों, अनुसूचित जनजातियों को अपने अधिकतम विकास के लिये पूरी सुरक्षा एवं सहायता सुनिश्चित की जाएगी।
✍️किसान इस देश का मालिक है, परन्तु वह अपनी ताकत को भूल बैठा है।
✍️देश की समृद्धि का रास्ता गांवों के खेतों एवं खलिहानों से होकर गुजरता है।
मिट्टी के लाल भारत की राजनीति के वास्तविक चौधरी
पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह जी को उनकी 32 वी पुण्य तिथि पर कोटि कोटि वंदन करता हूँ......
लेखक
कुलदीप रियाड़
Kuldeep riyar



Friday, 10 May 2019

चौधरी कुम्भाराम आर्य जयंती : कुलदीप रियाड़ Choudhary kumbharam aarya 's birth anniversary : Kuldeep riyar

जातिविहीन संकल्पना के सृजक, कमेरे वर्ग के नायक, निखालिस किसान नेता:- स्व. श्री कुम्भाराम आर्य
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"जाट का वोट जाट को, और जाट की बेटी जाट को" एक ऐसा नारा था जिसकी स्थापना कब "जाट वर्सेस अदर्स" में हो गयी पता ही नहीं चला। बहुत से लोग मानते हैं कि ये नारा कुम्भाराम जी आर्य ने दिया था।  जब किसी ने कुम्भाराम जी आर्य से इस नारे के प्रतिकूल असर और इस नारे की आवश्यकता का कारण पूछा तो श्री कुम्भाराम आर्य ने अश्रुमिश्रित मुस्कुराहट के साथ कहा कि "मैं कमेरे वर्ग के रूप में पूरे बहुजन समाज को एक सूत्र में पिरोना चाहता था। जाट,मेघवाल,कुम्हार,माली,गुर्जर, समेत हर व्यक्ति की पहचान उनकी जाति नहीं बल्कि सिर्फ किसान-कमेरे वर्ग के रूप में जानी जाए, परंतु राजनीति में जमे जमाये श्रेष्ठतावादी, जातिवादी लोगों को ये मंजूर नहीं था। ये नारा मेरे चिपकाकर मेरी राजनीतिक हत्या की जा रही है, और मैं जानता हूँ कि अब शेष बची उम्र में मैं ये झूठा दाग शायद ही धो पाऊंगा"।
मैनें कुंभाराम जी आर्य को मेरे दादा जी , पिताजी, विभिन्न जाट समाज की पुस्तकों को पढ़कर, जाटलैंड वेबसाइट और श्री आर्य पर लिखी किताबों के माध्यम से जाना।
चौधरी कुम्भाराम के बचपन का एक किस्सा जो मैंने उनकी जीवनी में पढ़ा जिससे वो चौधरी कुम्भाराम आर्य बने
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बचपन मे अपने मित्र जयलाल शर्मा के घर लुकाछिपि खेलते वक्त मटकों के पीछे श्री आर्य के छुपने और छू लेने पर उन मटकों को जयलाल शर्मा की माँ द्वारा गुस्से में भरकर  लाठी से फोड़ दिया गया। जातिवाद के जहर की घूंट पहली बार पीते ही कुम्भाराम आर्य के मन मे जातिवादी व्यवस्था और पाखंड के प्रति घृणा के बीज अंकुरित हूए और उन्होंने 13 वर्ष की अल्पायु में ही आर्य समाज के साथ  स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होकर अपनी जिंदगी,  देश एवं जातिविहीन समाज की स्थापना के नाम कर दी।
किसान सम्मेलनों में सभी किसान जातियों में आपस मे रोटी बेटी के सम्बंध को भविष्य की राजनीति में कमेरे वर्ग के वर्चस्व के लिए निहायत जरूरी बताने वाले श्री कुम्भाराम आर्य किसानों के सदैव अग्रदूत बने रहे।
बचपन मे प्लेग महामारी के कारण गांव छोड़ने के कारण ज्यादा पढ़ नहीं पाए किंतु जातिविहीन किसान कमेरे समाज की स्थापना के लिए शिक्षा के महत्व को भली भाँति जानते थे। जाट छात्रावास का नाम किसान छात्रावास कर उसे समस्त किसान जातियों के लिए अध्ययनशाला उपलब्ध कराने वाले श्री कुम्भाराम आर्य के हिस्से में अनेक उपलब्धियां आईं।
आज जब भी जाट वोट, जाट राजनीति, जाट वर्चस्व और जाट महासभा का जिक्र होता है तो लगता है कि अगर कुम्भाराम जी जीवित होते तो आज जाट समुदाय किसान कमेरे वर्ग से इतर एक अन्य किसान वर्ग के रूप में ना उभरा होता और ना ही "जाट वर्सेस अदर्स" जैसे जुमले अस्तित्व में ही आते।
आज किसान शब्द की आड़ में जातिवादी राजनीति करने वाले लोग श्री कुम्भाराम जी आर्य के सपनों के उतने ही हत्यारे हैं, जितने कि अंतर्जातीय विवाह के प्रबल पक्षधर श्री आर्य के जीवन के उत्तरार्ध में वो जातिवादी नारा उनके चिपका देने वाले लोग।
जाट निश्चित रूप से लोकतंत्र में एक जागरूक कौम, कमेरे वर्ग के अभिभावक एवं अग्रेसर की भूमिका में रही है। गाँवो में किसी गरीब के घर तक जाट के घर की छाछ एकता एवं सद्भाव के गीत गुनगुनाती हुई पहुंचती रही है। देश के 85 प्रतिशत उन्नत नस्ल के दुधारू पशुओं के मालिक जाट हैं।  बारिश होने पर गरीब किसान के खेत के लिए बीज एवं बैल की व्यवस्था करना जाट का प्रकृति प्रदत्त व्यवहार हुआ करता था। अगर भारत कृषि प्रधान देश है, तो उस के विकास रथ के पहिये की धुरी सदैव जाट रहा है।
आज कुम्भाराम जी आर्य के जन्मदिवस पर संकल्प लेना चाहिये, जातिविहीन कमेरे वर्ग की स्थापना, और लोकतंत्र में उसकी भागीदारी सुनिश्चित करने का।
#जमीन कींकी? जो बावै बिकी" कहकर उन्होंने हमें जमीन तो दे दी पर अब उस जमीन पर खड़े होकर लक्ष्य का निर्धारण और संधान हमें स्वयं को करना होगा। श्री कुम्भा राम जी का स्पष्ट सिद्धांत था कि जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। राजनीति में भागीदार बनें, आपके हिस्से का अधिकार आपकी झोली में स्वत: आएगा।
हमारे नेता, हम सबके नेता, हमारे खेत खलिहानों के नेता श्री कुम्भाराम जी आर्य को उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन
लेखक
कुलदीप रियाड़
Kuldeep riyar

Thursday, 28 March 2019

वक्त वक्त की बात है - कुलदीप रियाड़ kuldeep riyar


वक्त वक्त की बात है !
साथियों समय बड़ा बलवान है इसका एक प्रसंग याद आता है मुझे.........
दुनिया में सिकंदर कोई नहीं वक्त सिकंदर होता है हॉलीवुड के एक्शन हीरो और विश्वविख्यात बॉडी बिल्डर ,एथलीट,  कैलिफोर्निया गवर्नर  रहे 'अर्नोल्ड श्वार्ज़नेगर' Arnold schwarzenegger ने एक फोटो पोस्ट की है। अपनी मूर्ति के नीचे सोते हुए, जो उस होटल में लगी है जिसका फीता उन्होंने कैलिफोर्निया के गवर्नर रहते काटा था। होटल ने उनकी मूर्ति लगाते हुए उन्हें आजीवन होटल मे रूम फ्री में देने की घोषणा की थी। रिटायर होने के बाद एक दिन होटल में रूम मांगने पर होटल ने बुकिंग फुल है कह मना कर दिया।
अपनी ही मूर्ति के पास सोये और लिखा -
"पद और रसूख जाने के बाद दुनिया आपके लिए एक आम आदमी की तरह है" या फिर कहूं "सम्मान हमेशा समय और स्थिति  का होता है पर इंसान उसे अपना समझ लेता है।"
यह प्रसंग मुझे बहुत प्रेरणादायक लगा क्योंकि समय बदलते वक्त नही लगता...
इसके लिये सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा
Time is precious.
Make sure you spent it with the right people.
Blog written by-
Kuldeep riyar  कुलदीप रियाड़
Copyright reserved
©2019



Thursday, 14 March 2019

"उम्मीद नही छोडूंगा" - कुलदीप रियाड़ Will not leave hope : kuldeep riyar

                      उम्मीद नहीं छोडूँगा
कितने कंटक, प्रस्तर कितने
राहों पर हो चाहे बिखरे
मंजिल तक दौडूँगा
उम्मीद नहीं छोडूँगा
घनी रात है गहन अँधेरा
सूरज ने भी है मुख फेरा
स्याह मिथक तोडूंगा
उम्मीद नहीं छोडूँगा
झंझा झकोर है गर्जन तर्जन
डोल रहा आतंकित मन
प्रचंड वेग मोडूँगा
उम्मीद नहीं छोडूँगा
विश्वास महल हो गया खण्डहर
हिली नींव, गिर गई भींत , पर
फिर नई ईंट जोडूंगा
उम्मीद नहीं छोडूँगा............."कुलदीप"




Wednesday, 13 March 2019

डाबड़ा किसान आंदोलन

डाबड़ा किसान आंदोलन(13 मार्च 1947)
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डाबड़ा गाँव राजस्थान के नागौर जिले की डीडवाना तहसील में एक छोटा सा ऐतिहासिक गाँव है। यह वीर योद्धाओं  के बलिदानी इतिहास की थर्मो-पल्ली के नाम से जाना जाता है। डाबडा काण्ड भारत में स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हुए काण्डों में सबसे भयंकर था जो अमृतसर के जलियांवाला बाग काण्ड से कमतर नहीं है।
आजादी से पहले जमींदारों एवं जागीरदारों के अत्याचार का विरोध करने के लिए गाँव डाबड़ा में जागृति की अलख जगाने के लिए सम्मेलन था उसका उद्देश्य किसान हितों के साथ ही  गांवों में शिक्षा का प्रसार , राजनीतिक जागृति तथा समाज में व्यापक बुराइयों को दूर करना था|
लोक परिषद के नेता मथुरादास माथुर ,द्वारका प्रसाद एवं साथियों के नेतृत्व में लगभग 500-600 किसान एकत्रित हुए थे एवं बैठक का समय 11 बजे था परन्तु सभी नेता सुबह साढ़े सात बजे ही डाबड़ा पहुँच गए। वे सीधे चौधरी पन्नाराम लोमरोड़ के घर पहुंचे। पन्नाराम जी ने उनका स्वागत किया और कुछ चर्चाएँ की। इतने में जागीरदार के बुलाये हजारों की तादाद में ऊँटों व घोड़ों पर सवार जागीरदार के सशस्त्र लोगों ने धावा बोल दिया।
जिसमे कई साहित्यकारों का मानना है की लगभग 13 से ज्यादा किसान भाई शहीद हो गए थे जिनमें से कुछ के नाम इस प्रकार है
श्री रामूराम जी लोल, निवासी लाडनू (नागौर)
श्री रुघाराम जी लोल, निवासी लाडनू (नागौर)
श्री चुन्नी लाल जी शर्मा - निम्बी जोधा (नागौर)
श्री पन्नाराम जी लोमरोड़ -डाबडा,(नागौर)
श्री नंदराम जी मूंड -अड़कसर (नागौर )
डाबड़ा गाँव में उनकी यादगार में बने अमर शहीद स्तम्भ प्रांगण पर आज भी शहीद मेले का आयोजन होता है तथा उन वीर योद्धाओं को समस्त मानव जाति नमन कर प्रेरणा लेती है।
डाबड़ा कांड के शहीदों को समर्पित पंक्तियां
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"हिम्मत को परखने की गुस्ताखी ना करना,
पहले भी कई तूफानों का रूख मोड़ चुके है!!'
जय जवान जय किसान
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लेखक
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कुलदीप रियाड़ खांगटा
Kuldeep riyar
©2019

Tuesday, 1 January 2019

वर्ष 2018 के तजुर्बे.... कुलदीप रियाड़ Kuldeep riyar

              साल 2018 के तजुर्बे...

शुक्रिया उन लोगों का
जो मुझसे नफरत करते है...
            क्योंकि
उन्होंने मुझे मजबुत बनाया...

शुक्रिया उन लोगों का,
जो मुझसे प्यार करते है...
           क्योंकि,
उन लोगों ने मेरा दिल,
बड़ा कर दिया...

शुक्रिया उन लोगों का,
जो मेरे लिए परेशान हुए...
और मुझे बताया कि,दरअसल,
वो मेरा बहुत ख्याल रखते है...

      
शुक्रिया उन लोगों का,
जिन्होंने मुझे अपना बना के छोड़ दिया...
और मुझे अहसास दिलाया कि,
 दुनियाँ में हर चीज आखिरी नही होती...

 शुक्रिया उन लोगों का,
 जो मेरी जिंदगी में शामिल हुए,
 और मुझे ऐसा बना दिया,
 जैसा मैंने सोचा भी नही था...

और सबसे ज्यादा शुक्रिया मेरे भगवान को,
जिन्होंने हर हालात का सामना करने की मुझे हिम्मत दी

   सभी को  नूतन वर्ष  की हार्दिक शुभकामनाएं
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©
Kuldeep riyar
कुलदीप रियाड़