Friday, 10 May 2019

चौधरी कुम्भाराम आर्य जयंती : कुलदीप रियाड़ Choudhary kumbharam aarya 's birth anniversary : Kuldeep riyar

जातिविहीन संकल्पना के सृजक, कमेरे वर्ग के नायक, निखालिस किसान नेता:- स्व. श्री कुम्भाराम आर्य
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"जाट का वोट जाट को, और जाट की बेटी जाट को" एक ऐसा नारा था जिसकी स्थापना कब "जाट वर्सेस अदर्स" में हो गयी पता ही नहीं चला। बहुत से लोग मानते हैं कि ये नारा कुम्भाराम जी आर्य ने दिया था।  जब किसी ने कुम्भाराम जी आर्य से इस नारे के प्रतिकूल असर और इस नारे की आवश्यकता का कारण पूछा तो श्री कुम्भाराम आर्य ने अश्रुमिश्रित मुस्कुराहट के साथ कहा कि "मैं कमेरे वर्ग के रूप में पूरे बहुजन समाज को एक सूत्र में पिरोना चाहता था। जाट,मेघवाल,कुम्हार,माली,गुर्जर, समेत हर व्यक्ति की पहचान उनकी जाति नहीं बल्कि सिर्फ किसान-कमेरे वर्ग के रूप में जानी जाए, परंतु राजनीति में जमे जमाये श्रेष्ठतावादी, जातिवादी लोगों को ये मंजूर नहीं था। ये नारा मेरे चिपकाकर मेरी राजनीतिक हत्या की जा रही है, और मैं जानता हूँ कि अब शेष बची उम्र में मैं ये झूठा दाग शायद ही धो पाऊंगा"।
मैनें कुंभाराम जी आर्य को मेरे दादा जी , पिताजी, विभिन्न जाट समाज की पुस्तकों को पढ़कर, जाटलैंड वेबसाइट और श्री आर्य पर लिखी किताबों के माध्यम से जाना।
चौधरी कुम्भाराम के बचपन का एक किस्सा जो मैंने उनकी जीवनी में पढ़ा जिससे वो चौधरी कुम्भाराम आर्य बने
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बचपन मे अपने मित्र जयलाल शर्मा के घर लुकाछिपि खेलते वक्त मटकों के पीछे श्री आर्य के छुपने और छू लेने पर उन मटकों को जयलाल शर्मा की माँ द्वारा गुस्से में भरकर  लाठी से फोड़ दिया गया। जातिवाद के जहर की घूंट पहली बार पीते ही कुम्भाराम आर्य के मन मे जातिवादी व्यवस्था और पाखंड के प्रति घृणा के बीज अंकुरित हूए और उन्होंने 13 वर्ष की अल्पायु में ही आर्य समाज के साथ  स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होकर अपनी जिंदगी,  देश एवं जातिविहीन समाज की स्थापना के नाम कर दी।
किसान सम्मेलनों में सभी किसान जातियों में आपस मे रोटी बेटी के सम्बंध को भविष्य की राजनीति में कमेरे वर्ग के वर्चस्व के लिए निहायत जरूरी बताने वाले श्री कुम्भाराम आर्य किसानों के सदैव अग्रदूत बने रहे।
बचपन मे प्लेग महामारी के कारण गांव छोड़ने के कारण ज्यादा पढ़ नहीं पाए किंतु जातिविहीन किसान कमेरे समाज की स्थापना के लिए शिक्षा के महत्व को भली भाँति जानते थे। जाट छात्रावास का नाम किसान छात्रावास कर उसे समस्त किसान जातियों के लिए अध्ययनशाला उपलब्ध कराने वाले श्री कुम्भाराम आर्य के हिस्से में अनेक उपलब्धियां आईं।
आज जब भी जाट वोट, जाट राजनीति, जाट वर्चस्व और जाट महासभा का जिक्र होता है तो लगता है कि अगर कुम्भाराम जी जीवित होते तो आज जाट समुदाय किसान कमेरे वर्ग से इतर एक अन्य किसान वर्ग के रूप में ना उभरा होता और ना ही "जाट वर्सेस अदर्स" जैसे जुमले अस्तित्व में ही आते।
आज किसान शब्द की आड़ में जातिवादी राजनीति करने वाले लोग श्री कुम्भाराम जी आर्य के सपनों के उतने ही हत्यारे हैं, जितने कि अंतर्जातीय विवाह के प्रबल पक्षधर श्री आर्य के जीवन के उत्तरार्ध में वो जातिवादी नारा उनके चिपका देने वाले लोग।
जाट निश्चित रूप से लोकतंत्र में एक जागरूक कौम, कमेरे वर्ग के अभिभावक एवं अग्रेसर की भूमिका में रही है। गाँवो में किसी गरीब के घर तक जाट के घर की छाछ एकता एवं सद्भाव के गीत गुनगुनाती हुई पहुंचती रही है। देश के 85 प्रतिशत उन्नत नस्ल के दुधारू पशुओं के मालिक जाट हैं।  बारिश होने पर गरीब किसान के खेत के लिए बीज एवं बैल की व्यवस्था करना जाट का प्रकृति प्रदत्त व्यवहार हुआ करता था। अगर भारत कृषि प्रधान देश है, तो उस के विकास रथ के पहिये की धुरी सदैव जाट रहा है।
आज कुम्भाराम जी आर्य के जन्मदिवस पर संकल्प लेना चाहिये, जातिविहीन कमेरे वर्ग की स्थापना, और लोकतंत्र में उसकी भागीदारी सुनिश्चित करने का।
#जमीन कींकी? जो बावै बिकी" कहकर उन्होंने हमें जमीन तो दे दी पर अब उस जमीन पर खड़े होकर लक्ष्य का निर्धारण और संधान हमें स्वयं को करना होगा। श्री कुम्भा राम जी का स्पष्ट सिद्धांत था कि जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी। राजनीति में भागीदार बनें, आपके हिस्से का अधिकार आपकी झोली में स्वत: आएगा।
हमारे नेता, हम सबके नेता, हमारे खेत खलिहानों के नेता श्री कुम्भाराम जी आर्य को उनके जन्मदिवस पर शत शत नमन
लेखक
कुलदीप रियाड़
Kuldeep riyar

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