एक बार किसी साधु महात्मा को उनके उपदेशों से प्रभावित हो एक स्त्री ने उन्हें अपने घर खाने का निमंत्रण दिया । साधु निमंत्रण स्वीकार कर उस औरत के घर भोजन के लिए चल पड़े । रास्ते में जब लोगों ने उस स्त्री के साथ साधु को देखा तो, एक आदमी उनके पास आया और बोला कि आप इस औरत के साथ कैसे? संत ने बताया कि वह इस औरत के निमंत्रण पर उसके घर भोजन के लिए जा रहे हैं, यह जानने के बाद उस व्यक्ति ने कहा कि आप इस औरत के घर न जाऐं आप की अत्यंत बदनामी होगी क्योंकि यह औरत चरित्रहीन है। इसके बावजूद साधु न रुके, कुछ ही देर में यह बात जंगल में आग की तरह फैल गई। आनन फानन में गांव का मुखिया दौडता हुआ आ गया और साधु से उस औरत के यहां न जाने का अनुरोध करने लगा। विवाद होता देख साधु ने सबको शांत रहने को कहा, फिर मुस्कराते हुए मुखिया का एक हाथ अपने हाथ में कस कर पकड़ लिया और बोले क्या अब तुम ताली बजा सकते हो? मुखिया बोला एक हाथ से भला कैसे ताली बजेगी । इस पर साधु मुस्कुराते हुए बोले जैसे एक हाथ से ताली नहीं बज सकती तो अकेली स्त्री कैसे "चरित्रहीन" हो सकती है जब तक कि एक पुरुष उसे चरित्रहीन बनने पर बाध्य न करे। चरित्रहीन पुरुष ही एक स्त्री को चरित्रहीन बनाने में जिम्मेदार है। यह कैसी विडम्बना है कि इस कथित " पुरुष प्रधान समाज के अभिमान में ये पुरुष अपनी झूठी शान के लिए स्त्री को केवल अपने उपभोग की वस्तु भर समझता है और भूल जाता है कि जिस स्त्री को वह चरित्रहीन कह रहा है उसका जिम्मेदार वह स्वयं है।
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अपनी सोच को बदलिए !
न ही ऐसे कर्म करे !
बदलाव की पहल खुद से शुरू करे ......
"मिजाज यूं ही ना चिड़चिड़ा कीजिये
कोई बातें छोटी करे तो आप दिल बड़ा कीजिये.."
©
Kuldeep Riyar
Wow. ..
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