Wednesday, 20 June 2018

बाज का जीवन : कुलदीप रियाड़ Hawk's life : Kuldeep riyar

बाज लगभग 70 वर्ष जीता है, परन्तु अपने जीवन के 40वें वर्ष में आते आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है।

उस अवस्था में उसके शरीर के तीन प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं-

1. पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है व
शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं।

2. चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है और भोजन निकालने में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है।

3. पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूरे खुल नहीं पाते हैं, उड़ानें सीमित कर देते हैं।

भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना और भोजन खाना....तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं। उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं,
या तो देह त्याग दे, या अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे...या फिर
स्वयं को पुनर्स्थापित करे, आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में। जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, वहीं तीसरा अत्यन्त पीड़ादायी और लम्बा।

बाज पीड़ा चुनता है और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है। वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है, और तब प्रारम्भ करता है पूरी प्रक्रिया।

सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है..! अपनी चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं पक्षीराज के
लिये। तब वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने की। उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है और प्रतीक्षा करता है पंजों के पुनः उग आने की। नये चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक एक कर नोंच कर निकालता है और प्रतीक्षा करता पंखों के पुनः उग आने की।

150 दिन की पीड़ा और प्रतीक्षा...और तब उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान, पहले जैसी नयी।

इस पुनर्स्थापना के बाद वह 30 साल और जीता है, ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ।

प्रकृति हमें सिखाने बैठी है-
पंजे पकड़ के प्रतीक हैं,
चोंच सक्रियता की और
पंख कल्पना को स्थापित करते हैं।

इच्छा परिस्थितियों पर नियन्त्रण बनाये रखने की, सक्रियता स्वयं के अस्तित्व की गरिमा बनाये रखने की, कल्पना जीवन में कुछ नयापन बनाये रखने की।

इच्छा, सक्रियता और कल्पना...तीनों के तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं.. हममें भी चालीस तक आते आते।

हमारा व्यक्तित्व ही ढीला पड़ने लगता है, अर्धजीवन में ही जीवन समाप्तप्राय सा लगने लगता है, उत्साह, आकांक्षा, ऊर्जा... अधोगामी हो जाते हैं। हमारे पास भी कई विकल्प होते हैं- कुछ सरल और त्वरित.!
कुछ पीड़ादायी... हमें भी अपने जीवन के विवशता भरे अतिलचीलेपन को त्याग कर नियन्त्रण दिखाना होगा- "बाज के पंजों की तरह।"

हमें भी आलस्य उत्पन्न करने वाली वक्र मानसिकता को त्याग कर ऊर्जस्वित सक्रियता दिखानी होगी-
"बाज की चोंच की तरह।"

हमें भी भूतकाल में जकड़े अस्तित्व के
भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी-
"बाज के पंखों की तरह।"

150 दिन न सही, तो एक माह ही बिताया जाये, स्वयं को पुनर्स्थापित करने में। जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही, बाज तब उड़ानें भरने को तैयार होंगे,
इस बार उड़ानें
और ऊँची होंगी,
अनुभवी होंगी,
अनन्तगामी होंगी....!
मेरे हिसाब से बाज के जीवन से हमे बहुत कुछ सिखने को मिलता है....
इसलिये एक बात में अक्सर कहता हूँ जिंदगी में अगर बाज की तरह उड़ना चाहते हो तो तीतरों का साथ छोड़ दो।
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Kuldeep riyar

Saturday, 16 June 2018

Kuldeep riyar : कर्म

कर्मों से डरिये ईश्वर से नही......
ईश्वर माफ कर देगा लेकिन कर्म नही !!

अटल सत्य है कि जैसे 100 गायों में से भी बछड़ा अपनी माँ को ढूंढ लेता है ....
ठीक वैसे ही कर्म ही कर्ता को ढूंढ लेता है....
आज नही तो कल!!
सदैव अच्छे कर्म करिये , अच्छे व्यक्तियो के साथ रहिये...
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जहां बुजुर्गों के बताये उसूल चलते है
वहां संस्कार खत्म नही होते.....
पुराना पैड अगर फल नही देता है
तो छाया तो.जरूर देगा🌲🌲🌲

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व्यावहारिक को आदर्श बताकर यथार्थ के चश्मे से देखना के बजाय यथार्थ को आदर्श बनाने का प्रयास हो।
 
सादर
Kuldeep riyar

Thursday, 14 June 2018

Kuldeep Riyar : भारत भूमि के रक्षार्थ अपने प्राणों का बलिदान करने वाले वीर शहीदो को कोटि कोटि नमन

भारत भूमि की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाले शूरवीर योद्धाओं को नमन 
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किसे पहले नमन करूँ, शहीद को या शहीद की वीरांगना को,एक ने अपने खून से और एक ने अपने सिंदूर से तिरंगे में रंग भरे हैं। याद रखना कफन पर रखे ये फूल ही नही,बल्कि भारत की छाती पर रखा एक ऋण है।


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यह कल्पना करना ही मात्र इतना बड़ा दुःख है किसी परिवार के ऊपर, कि एक बाप को उसका मात्र "20” दिन का बेटा मुखाग्नि दे
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तारीख तय थी दिन तय था शहीद हंसराज गुर्जर को आना आज ही था।
लेकिन इस तरह पार्थिव देह बनकर नहीं...छुट्टी पर।

दो साल की बेटी अनजान बन पिता के स्नेह का इंतजार कर रही थी! महज 20 दिन का बेटा आंखे मूंद मां के आंचल से दूर दूध को तरस रहा था! शहीद की पत्नी बेसुध पड़ी थी।माता-पिता का गांव वाले धीरज बंधाते है....

भारत भूमि के लाडले ,  शहादत को प्राप्त करने वाले अमर हुतात्मा शहीद जितेन्द्र सिंह जी , अमर शहीद रजनीश कुमार जी , अमर शहीद रामनिवास जी , अमर शहीद हंसराज गुर्जर जी को कोटि कोटि नमन......


कैसे सोऊ सुकून की नींद में साहब...

सुकून से सुलाने वालों के तो शव आ रहें हैं..
    

        शहीदों को सलाम...


आखिर कब तक देश का जवान सीमा पर शहीद होता रहेगा....
सरकारेे आती रहेगी जाती रहेगी ... लेकिन एक जवान के , किसान के जीवन स्तर में क्या बदलाव आएगा ?

लेकिन आज के इन फेसबुकिया , व्हाट्स एपिया युवाओं को भगवे रंग की डीपी लगाने से फुर्सत है नहीं.....

बूढ़े देश चला रहे है और युवा फोन ...????


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अंत में एक सवाल करूंगा देश के सताधीशो से..?


"तुमने दस दस लाख दिए है सैनिक की वीरांगना को 
सोचा कीमत लौटा दी है वीर प्रसूता मां को 
लो में बीस लाख देता हूं तुम किस्मत के हेटो को 
हिम्मत है तो मंत्री भेजे लड़ने अपने बेटो को..."


जय हिन्द जय भारत 
शहीदो को नम आंखों से श्रदांजलि
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Kuldeep Riyar



Wednesday, 13 June 2018

Kuldeep Riyar : Save Marwari language

अपनी मातृ भाषा का प्रयोग जरूर करे...!!
मारवाड़ी  को अब भाषा का दर्जा मिलना चाहिए...!

अणमांग्या मोती मिलै, मांगी मिलै न भीख।

शब्दार्थ :- बगैर मांगे मोती मिल जाता है,जबकि मांगने से भीख भी नहीं मिलती है।
भावार्थ :- मांगे बगैर भी कोई मुल्यवान चीज़ मिल जाती है जबकि कई बार मांगने पर भी तुच्छ वस्तु हांसिल नहीं होती है,वरन आत्मसम्मान को भी ठेस पहुंचती है।

#savemarwadi

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Kuldeep Riyar